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वन परिक्षेत्र रतनपुर मे राजसात वाहन रिहाई : रिटायर्ड CCF प्रभात मिश्रा के आदेश और वन परिक्षेत्र अधिकारी की मिलीभगत से मचा हड़कंप — लाखों की लेन-देन और विभागीय हस्तक्षेप के आरोप…?

जीशान अंसारी की रिपोर्ट, बिलासपुर(खबरों का राजा) । अरपा नदी किनारे अवैध रेत उत्खनन में पकड़े गए वाहनों की रिहाई को लेकर बिलासपुर वन वृत्त में बड़ा बवाल खड़ा हो गया है। यह मामला की एक कमीशनखोरी की ऑडियो सोशल मिडिया मे वायरल हो रहा जिसकी पुष्टि खबरों का राजा नहीं करता है और विभागीय सूत्रों के मुताबिक, रिटायर्ड मुख्य वन संरक्षक (CCF) प्रभात मिश्रा ने लाखों रुपये की डील के बाद राजसात किए गए वाहनों को मुक्त कर दिया। इस आदेश ने न केवल प्रकरण की गंभीरता को कम कर दिया, बल्कि वन विभाग की ईमानदार टीम की कार्रवाई पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।कैसे शुरू हुआ मामला :-                                                30 सितम्बर 2024 की रात रतनपुर परिक्षेत्र की गश्त टीम ने अरपा नदी किनारे अवैध रेत उत्खनन करते हुए हाईवा, ट्रैक्टर और पोकलेन सहित कई वाहन पकड़े थे। कुल 10 वाहन और 28 घन मीटर रेत जब्त की गई थी, जिसे भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत राजसात कर शासकीय संपत्ति घोषित कर दिया गया था।

अपीलीय आदेश ने पलट दी कार्रवाई :-                          वाहन मालिकों की अपील पर रिटायर्ड अधिकारी प्रभात मिश्रा ने 23 जून 2025 को आदेश जारी कर वाहनों को मुक्त कर दिया। उन्होंने कहा कि घटना स्थल और वन कक्षों का सटीक उल्लेख नहीं किया गया तथा यह साबित नहीं होता कि रेत अरपा नदी से ही निकाली गई थी। इस तर्क के आधार पर राजसात आदेश को निरस्त कर दिया गया। आखिर मोटी रकम की जुगाड़ ने आदेश को ही पलट दिया। 

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‘डील’ के आरोप और विभागीय हलचल :-                        सूत्रों के अनुसार, यह आदेश लाखों रुपये की सांठगांठ के बाद जारी किया गया। पहले IFS अधिकारी द्वारा राजसात का ठोस आदेश दिया गया था, जिसे प्रभात मिश्रा ने “विभागीय त्रुटियों” का हवाला देकर पलट दिया। वन परिक्षेत्र के विभागियो कर्मचारी में यह चर्चा बना हुआ है और कर्मचारियों की मनोबल भी टूट गया है ज़ब भी कोई बड़ी कार्यवाही करते है तो “ऊपरी स्तर पर डील कर के राजसात वाहन को भी छुड़ा लेते हैं।”

‘सिंह बंगला’ का दबाव और राजनीति :-                      विभागीय सूत्रों का दावा है कि रायपुर स्थित ‘सिंह बंगला’ से लगातार हस्तक्षेप किया जाता है —: किस रेंजर या डिप्टी रेंजर को हटाना या रखना है, किस ठेकेदार को काम दिलाना है, सब ऊपर से तय होता है।कई वरिष्ठ अधिकारी इस दखल से नाराज़ हैं और इसे “राजनीतिक व प्रशासनिक नियंत्रण” बता रहे हैं।

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गंभीर सवाल :- मुख्यमंत्री और वन मंत्री प्रभात मिश्रा जैसे अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं कर पा रहे…? क्या वन विभाग राजनीतिक या संगठनात्मक प्रभाव में बंध गया है…? अगर निचले स्तर की टीम कार्रवाई करती है, तो उनके निर्णय को ऊपरी अधिकारी क्यों पलट देते हैं…? यह विवाद केवल वाहन रिहाई का नहीं, बल्कि वन विभाग में जड़ जमाए भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप की परतों को उजागर करता है। अगर हर जप्ती “सेटिंग” से रद्द होती रही, तो निचले स्तर के ईमानदार कर्मचारियों का मनोबल टूटना तय है।

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